बाड़मेर में कांग्रेस की जीत का आधार उसका बेसिक फार्मूला रहा। जातिगत वोटों का गणित कांग्रेस के पक्ष में रहते ही राह आसान हो जाती है। कांग्रेस की हार बड़े नेताओं की लड़ाई पर होती है और जीत का तरीका है इनका एक रहना। भाजपा का धरातल विधानसभा चुनावों के बाद खिसक गया था। पहले दिन से हार की लड़ाई लड़ी जा रही थी। बड़े नेताओं को भी पता था कि मुश्किल है लेकिन मुमकिन करने को ताकत झौंकने में कमी नहीं रखी। कांग्रेस के लिए बाड़मेर में जातिगत वोट बैंक का एक फार्मूला है, जेएमएम यानि जाट, मुसलमान, मेघवाल। कांग्रेस ने इस बार इस फार्मूले पर काम किया। तीनों ही बड़े वोट बैंक पक्ष में रहने से कांग्रेस के लिए जीत की राह आसान हुई। कांग्रेस में बड़े नेताओं की लड़ाई की वजह से नीचे के स्तर इसका असर जाता है। इस चुनाव में कांग्रेस के बड़े नेता एक हो गए। कद्दावर नेताओं के बाद में दूसरी कतार के नेताओं ने भी फोलोवर्स की भूमिका निभाई तो कहीं पर वे चुप रहकर साथ हो गए। कांग्रेस ने यहां चुनाव की पूरी कमान बायतु विधायक हरीश चौधरी के हाथ दे दी। हरीश चौधरी ने हेमाराम चौधरी को साथ ले लिया। इस जोड़ी ने मुसलमान नेताओं को अपने पक्ष में करने का कार्य किया। अमीनखां की वजह से जो बड़ा वोट बैंक खिसकने की नौबत थी,उसमें सैकण्ड लाइन को पकड़ लिया। ऐन समय पर चौहटन के गफूर अहमद को जिला अध्यक्ष बनाकर तुरूप का पत्ता खेला। प्रत्याशी उमेदाराम बायतु से रालोपा से चुनाव हारे थे। नागौर में रालोपा ने गठबंधन किया ,लेकिन बाड़मेर में उमेदाराम को कांग्रेस में लाया गया। यदि रालोपा से गठबंधन होता तो कांगे्रस का बड़ा वोट बैंक यहां साथ देता या नहीं, यह संशय था। कांग्रेस के पक्ष में यह निर्णय भी रहा। भाजपा के लिए बड़ी चुनौती है कि उसका वोट बैंक कौन है? जहां कांग्रेस 5 लाख से अपने वोटों की गिनती मानती है वहीं भाजपा गिनाने के लिए काडर वोट की बात करती है लेकिन वो काडर बार-बार खिसक जाता है। ऐसे में भाजपा के लिए बड़ी चुनौती है कि वह अपना वोट बैंक बनाए।
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